मालूम हुवा के मौलाना साहब नसरानी के तोरो तरीके को पसंद करते थे, और उसे अच्छा जानते थे,
[इरशादाते हज़रत गंगोही रह. सफा ६५]
*मेरे भाइयो..!!*
*ये मोलवी साहब सिर्फ गैरों के तरीकों को पसंद करते थे, उस पर चलते नहीं थे, तो अल्लाह ने दुनिया ही में जिसका तरीक़ा उनको पसंद था उसके साथ हश्र कर दिया,*
हम तो गैरो के तरीको पर चलते है..! बल्कि उस पर नाज़ करते है.! और फख्र से मानते है, तो हमारा क्या हश्र होगा..?
सोचो..!!
*और अपनी शक्लो सूरत, लिबास, रहन सहन, ख़ुशी गमी में इस्लामी तरीको को लाये और हम गैरों के तेहवार मानाने से बचे. अल्लाह हमें तौफीक दे.*
आमीन.
و الله اعلم بالصواب
*इस्लामी तारीख़*
२७ रबीउल आखर १४४२ हिजरी
मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.
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الأحد، 13 ديسمبر 2020
𝐈𝐬𝐥𝐚𝐦𝐢𝐜 𝐌𝐬𝐠 𝐎𝐟𝐟𝐢𝐜𝐢𝐚𝐥's Post
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